तरावीह की नमाज़ का बयान।


  तरावीह की नमाज़ से मुताल्लिक कुछ ज़रूरी बातें

   💫     रमज़ान की रातों में बीस रकाअत तरवीह की नमाज़ इशा के फ़र्ज के बाद मर्द और औरतों के लिये सुन्नते मोअक्कदा है जो छोड़ने की आदत डाले वह गुनाहगार है कभी कभार छूट जाने में गुनाह नहीं और उसकी जमाअत सुन्नते किफ़ाया है अगर सब लोग घरों में पढ़े मस्जिद में जमाअत ही न हो तो सब गुनाहगार होंगे और अक्सर लोग मस्जिद में जमाअत से अदा करें और कोई शख़्स घर में पढ़े तो वह गुनाहगार नही लेकिन पांचो वक़्त फजर व ज़ोहर असर व मगरिब व इशा की। नमाज़ की अदायगी मज़हबे इस्लाम में सबसे अहम फ़रीज़ा है। एक वक़्त की नमाज़ छोड़ना भी बड़ा हराम है और वे वजह जमाअत छोड़ने की आदत भी गुनाहे कबीरा व हराम है।

   कुछ लोग कहते हैं कि तरावीह पढ़े तो पूरी रोज़ाना महीने भर या फिर किसी दिन न पढ़े और पाबन्दी न कर पाने की वजह से बिल्कुल नही पढ़ते तो या उनकी गलत फहमी नादानी और जिहालत है सही बात यह है कि जिस दिन पढ़ी जायेगी उस दिन का सवाब। मिलेगा और जिस दिन नहीं पढ़ी उस दिन का सवाब नही मिलेगा। और बे मजबूरी छोड़ने की आदत डाले तो गुनाहगार होगा।

    औरतों के लिये भी तरावीह सुन्नते मोअक्कदा है लेकिन इन्हे मस्जिदों में जाने की इजाज़त नही घरों में अदा करें जमाअत भी कर सकती हैं लेकिन औरत इमामत न करे कोई मर्द करे जब कि उस जमाअत से मस्जिद की जमाअत पर खास फर्क न पड़े और जमाअत मे अगर मर्द, बच्चे और औरतें सब हों तो इमाम के पीछे मर्द फिर बच्चे फिर औरतें खड़ी हों। सिर्फ औरतों की इमाम अगर औरत हो। तब भी नमाज़ हो जाएगी ले किन कराहत के साथ।

    कुछ लोग रमज़ान में शुरू के चन्द दिनों में हाफ़िज़ से तरावीह में पूरा कुरआन सुन-लेते हैं और फिर बाकी दिनो तरावीह के वक़्त आज़ाद घूमते हैं यह एक गलत तरीका और रिवाज है उन पर बाकी दिनों की तरावीह छोड़ने का वबाल रहेगा। तरावीह में सिर्फ़ कुर्आन सुनना पढ़ना ही सुन्नत नहीं बल्कि पूरे महीने तरावीह पढ़ना भी सुन्नत है और कई कई पारे एक दिन में पढ़कर चन्द दिनों में कुर्आन ख़त्म कर देना भी मुनासिब नहीं बेहतर और मुनासिब तरीका यही है कि एक पारे से कुछ ज्यादा रोज़ाना पढ़ते रहें और सत्ताईसवीं शब में कुर्आन ख़त्म करें। इसी में हिकमत मसलेहत है। और यही साहाबा-ए-किराम से मरवी है।

📚 रमज़ान का तोहफ़ा सफ़हा 12,13📚



Note:- हम सुन्नी मुसलमान अपना इरादा रमज़ान के पूरे रोज़े रखने का करले और व जमाअत नमाज़ और तरावीह पढ़ने की भी नियत करले इन्शा अल्लाह तआला किसी परेशानी की वजह से अगर चन्द रोज़े छूट भी गए तो इसका गुनाह न हो होगा लेकिन इसका कफ्फारा तुम्हारे जिम्मे ज़रूर होगा दुआ करें अल्लाह तआला इस माहे मुबारक के रोज़े हम गुनहगारों को नसीब फरमाए!

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