हज का बयान - हज क्यों किया जाता है।

हज नाम है एहराम बाँध कर नवीं जिलहिज्जा को अरफात में ठहरने और कअबा शरीफ के तवाफ का, और उसके लिये एक खास वकत मुकर्रर है कि उसमें यह अफ़आल (काम) किये जायें तो हज है। सन् 9 हिजरी में फर्ज हुआ उसकी फर्जियत कतई है जो उसकी फर्जियत का इन्कार करे काफिर है, मगर उम्र में सिर्फ एक बार फर्ज है।

Haj ka bayan - Deeni Knowledge

 हज के फराइज


मसअला : हज में ये चीजें फर्ज है :
  1. एहराम।
  2. वुकूफे अरफा यानी नवीं जिलहिज्जा के आफ़ताब ढलने से दसवीं की सुबहे सादिक से पहले तक किसी वक्त अरफात में ठहरना।
  3. तवाफे ज्यारत ।
  4. नियत
  5. तरतीब यानी पहले एहराम बांधना फिर वुकूफ फिर तवाफ।
  6. हर फर्ज का अपने वक्त पर होना यानी वुकूफ उस वक्त होना! जो मजकूर हुआ उसके बाद तवाफ उसका वक्त वुकूफ के बाद से आखिर उम्र तक है।
  7. मकान यानी वुकूफ जमीने अरफात में होना! सिवाए उरना के (बतने उरना मैदाने अरफात में या उसके करीब एक जगह है उसको छोड़ कर अरफात में जहाँ चाहे ठहरे) और तवाफ़ का मकान मस्जिदे हराम शरीफ है।

हज के वाजिबात


मसअला : हज के 26 वाजिबात ये हैं।

(1) मीकात से एहराम बांधना, यानी मीकात से बगैर एहराम न गुजरना और अगर मीकात से पहले ही एहराम बांध लिया तो जाइज़ है।
(2) सफा व मरवा के दरमियान दौड़ना इसको सई कहते हैं।
(3) सई को सफा से शुरू करना और अगर मरवा से शुरू की तो पहला फेरा शुमार न किया जाए उसका इआदा करे यानी दोबारा करे।
(4) अगर उज़्ऱ न हो तो पैदल सई करना।
(5) दिन में वुकूफ किया तो इतनी देर तक वुकूफ करे की आफताब डूब जाए ख्वाह आफताब ढलते ही शुरू किया हो।
(6) वुकूफ में रात का कुछ हिस्सा आ जाना।
(7) मुजदलफा में ठहरना।
(8) मगरिब व इशा की नमाज वक्ते इशा में मुजदलफा में आकर पढ़ना।
(9) जमरों पर दसवें, ग्यारवें और बाहरवें तीनों दिन कंकरियाँ मारना यानी दसवीं को सिर्फ जमरतुल अक़बा पर और ग्यारवें, बाहरवें को तीनों पर भी करना यानी कंकरियाँ मारना।
(10) जमरतुल अक़बा की रमी सर के बाल बिल्कुल साफ करवाने से पहले होना।
(11) हर रोज की रमी का उसी दिन होना।
(12) सर मुंडाना या बाल कटवाना।
(13), 14 अय्यामे नहर यानी कुर्बानी के दिनों में और हरम शरीफ में होना अगरचेे मिना में न हो।
(15) किरान व तमत्तोअ वाले को कुर्बानी करना।
(16) और उस कुर्बानी का हरम और अय्यामे नहर में होना।
(17) तवाफे इफाजा का अकसर हिस्सा अय्यामे नहर में होना। (अरफात से वापसी के बाद जो तवाफ किया जाता है उसका नाम तवाफे इफाजा है और इसे तवाफे ज़ियारत भी कहते है।)
(18) तवाफ हतीम के बाहर से होना।
(19) दाहिनी तरफ से तवाफ करना यानी काबए मुअज्जमा तवाफ करने वाले की बाई जानिब हो।
(20) उज़्र न हो तो पाँव से चल कर तवाफ करना।
(21) तवाफ़ करने में मजासते हुक्मिया से पाक होना यानी जुनुब व बे-वुज़ू न होना अगर बे-बुजू या जनाबत में तवाफ किया तो दोबारा करें।
(22) तवाफ़ करते वक्त सत्र छुपा होना यानी अगर एक उज्व की चौथाई या इससे ज्यादा हिस्सा खुला रहा तो दम (कुर्बानी) वाजिब होगा।
(23) तवाफ़ के बाद दो कअत नमाज पढ़ना, न पढी तो दम वाजिब नहीं।
(24) कंकरियाँ फेंकने और जिबह करने और सर मुंडाने और तवाफ में तरतीब यानी पहले कंकरियाँ फेंके फिर कुर्बानी करे फिर सर मुंडाए फिर तवाफ करे।
(25) तवाफे सद्र यानी मीकात से बाहर के रहने वालों के लिए रूखसत होते वक्त तवाफ करना, अगर हज करने वाली हैज़ या निफास से है और तहात से पहले काफिला रवाना हो जाएगा तो उस पर तवाफे रूखसत नहीं ।
(26) तुकूफे अरफा के बाद सर मुंडाने तक जिमाअ न होना एहराम के मना की हुई बातें मसलन सिला कपड़ा पहनने और मुँह या सर छुपाने से बचना।

मसअला : वाजिब के तर्क से यानी छोड़ने से दम (कुर्बानी) लाजिम आती है ख़्वाह कसदन तर्क किया हो या सहवन, खता के तौर पर हो या भूल कर, वह शख्स उसका वाजिब होना जानता हो या नहीं। हाँ अगर कसदन करे और जानता भी हो तो गुनाहगार भी है मगर वाजिब के तर्क से हज बातिल (बेकार) न होगा अलबत्ता कुछ वाजिब इस हुक्म से अलग हैं कि उनके तर्क पर दम (कुर्बानी) लाजिम नहीं! मसलन तवाफ़ के बाद की दोनों रकअतें या किसी उज़्र की वजह से
सर न मुंडाना या मगरिब की नमाज का इशा तक मुअख्खर न करना यानी देर न करना या किसी वाजिब का तर्क ऐसे उज़ से जिसको शरीअत ने मोतबर रखा हो यानी वहाँ इजाजत दी हो और कफ्फारा साकित कर दिया हो।

आपको यह जानकारी कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताएं और इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।


Previous
Next Post »